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🚩 🌺माँ दुर्गा सेवा समिति एवं नव युवक रामलीला समिति, बादशाह नगर, बाराबंकी • पावन नवरात्रि महोत्सव एवं भव्य रामलीला में आपका हृदय से हार्दिक स्वागत करती है • माँ दुर्गा का आशीर्वाद आप सभी पर सदैव बना रहे 🌺 🚩जय माता दी 🚩

माँ दुर्गा सेवा समिति · बादशाह नगर

हमारी यात्रा

आस्था से आरंभ हुई एक सामूहिक यात्रा — स्मृतियों में सँजोई, सेवा से आगे बढ़ती रही

19822026
1982–2026यात्रा के दर्ज पड़ाव
1993पहली दुर्गा समिति
2017नव युवक रामलीला समिति
यात्रा देखें ↓
भूतकाल · वर्तमान · भविष्य

आस्था की विरासत, सेवा की निरंतरता

यह यात्रा उन सभी श्रद्धालुओं, सेवाभावी व्यक्तियों और पीढ़ियों के योगदान की कहानी है, जिन्होंने अपनी श्रद्धा और समर्पण से इस पावन परंपरा को आगे बढ़ाया। उपलब्ध जानकारी के आधार पर बीते वर्षों की महत्वपूर्ण घटनाओं को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस विरासत से जुड़ सकें और इसे आगे बढ़ा सकें।

1982 — 2026

समय के साथ हमारी यात्रा

हर वर्ष एक स्मृति; हर स्मृति में सामूहिक आस्था की लौ।

‘आफ़र’ की जमीन और चकबंदी

गाँव के पूर्व में श्री ठाकुर दिनेश प्रताप सिंह का बाग हरिजन आबादी के विस्तार के लिए छोड़ा गया। ग्रामीण यहाँ फसल की मड़ाई करने लगे और जमीन ‘आफ़र’ कहलाने लगी।

मूर्ति स्थापना, समिति गठन और प्रथम पुजारी

मूर्ति स्थापना का विचार श्री लल्ला वर्मा, श्री दिवाकर वर्मा और श्री राम तीरथ वर्मा ने रखा। श्री दिनेश प्रताप सिंह के प्रयासों से प्रथम दुर्गा समिति बनी; श्री देवेंद्र नारायण चौहान प्रथम पुजारी बने।

रामलीला का प्रारंभ

बादशाह नगर की रामलीला परंपरा का आरंभ।

पुरानी पकड़िया और दो नीम

श्री रामसमुझ गौतम (श्री भंडारी बाबा हुसैनी गौतम के पिता) ने विद्युत पोल के पास पुरानी पकड़िया और मंदिर के सामने दो नीम लगाए।

मंदिर की दीवारें

वर्ष 2000 के आसपास मंदिर की दीवारें खड़ी की गईं।

मंदिर की छत

श्री बाराती लाल वर्मा ने 11,000 रुपये दिए। अतिरिक्त ग्रामदान से श्री सुंदर लाल विश्वकर्मा और श्री श्याम लाल राजपूत ने छत डाली।

रामलीला का पुनः आरंभ और नीम का चबूतरा

लगभग 2013 में श्री सुमित कुमार मिश्रा और श्री पुत्ती लाल रावत के निर्देशन में रामलीला फिर शुरू हुई। श्रीमती प्रेमावती (स्मृतिशेष श्री रामेश्वर मिश्र) ने नीम के पास पूजनीय चबूतरा बनवाया।

मंदिर का प्लास्टर और फर्श

यूकेलिप्टस के पेड़ बेचने से मिले 14,000 रुपये से श्री सुमित मिश्रा और श्री राजेश यादव की अध्यक्षता में प्लास्टर और फर्श बना।

भव्य गुंबद और नई पकड़िया

श्री राजेश कुमार रावत के 1,50,000 रुपये और प्रधान श्री निर्गेश कुमार गौतम के दान से गुंबद का काम शुरू हुआ। श्री सुनील कुमार वर्मा ने नई पकड़िया लगाई।

‘नव युवक रामलीला समिति’ नामकरण

श्री रवि कुमार यादव के सुझाव पर रामलीला को ‘नव युवक रामलीला समिति’ नाम दिया गया।

2019

स्थायी मूर्ति स्थापना

13 अप्रैल 2019 को माँ दुर्गा की स्थायी मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा विधि-विधान एवं वैदिक मंत्रोच्चार के साथ श्रद्धापूर्वक संपन्न हुई। इस पावन अवसर पर धार्मिक अनुष्ठानों एवं पूजा-अर्चना के माध्यम से माँ दुर्गा की मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा की गई। यह दिन मंदिर की आस्था और धार्मिक परंपरा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण एवं अविस्मरणीय पड़ाव बना।

प्रतिनिधि चित्र; यह 13 अप्रैल 2019 की स्थापना की ऐतिहासिक तस्वीर नहीं है।

पकड़िया वृक्षों के चबूतरे

6 नवंबर 2025 को श्री संदीप कुमार वर्मा की अध्यक्षता में मिस्त्री श्री शंभू शरण राजपूत, श्री राम करन रावत और श्री सुशील कुमार वर्मा ने पुराने और नए पकड़िया के चबूतरे बनाए।

समिति का नाम और आधिकारिक वेबसाइट

गुंजन कुमार के सुझाव पर समिति का नाम ‘माँ दुर्गा सेवा समिति’ रखा गया तथा शिव ओम मिश्र के सुझाव एवं तकनीकी प्रयासों से माँ दुर्गा सेवा समिति की आधिकारिक वेबसाइट का निर्माण किया गया। वेबसाइट के साथ एक व्यवस्थित प्रशासनिक प्रबंधन प्रणाली (Admin Management System) भी विकसित की गई, जिससे समिति की जानकारी, दान एवं अन्य आवश्यक गतिविधियों का डिजिटल रूप से प्रबंधन और संचालन सुगम हुआ।

एक अनिर्दिष्ट स्मृति

पत्थर की माँ दुर्गा प्रतिमा की खोज

श्रीमती प्रेमावती (स्मृतिशेष श्री रामेश्वर मिश्र) ने चबूतरे का निर्माण शुरू कराया। भराव के समय पीछे के गड्ढे से मिट्टी खोदते हुए माँ दुर्गा की पाषाण प्रतिमा प्रकट हुई। इसकी तिथि उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण में निर्दिष्ट नहीं है।

तिथि अनिर्दिष्ट
खोजी गई पाषाण प्रतिमा
ईंट, श्रम और श्रद्धा

मंदिर निर्माण यात्रा

स्थापना के विचार से मंदिर के आकार लेने तक — चरणों का अभिलेख, उपलब्ध विवरण के साथ।

01

1993

माँ दुर्गा की मूर्ति स्थापना का विचार

श्री लल्ला वर्मा, श्री दिवाकर वर्मा और श्री राम तीरथ वर्मा के मन में पहली बार माँ दुर्गा की मूर्ति स्थापित करने का पावन विचार आया।

02

1993

प्रथम दुर्गा समिति और प्रथम पुजारी

श्री दिनेश प्रताप सिंह के प्रयासों से प्रथम दुर्गा समिति बनी। एक साधु-बाबा के आगमन के पश्चात् श्री देवेंद्र नारायण चौहान ने प्रथम पुजारी का दायित्व संभाला।

03

तिथि अनिर्दिष्ट

चबूतरा निर्माण और पाषाण प्रतिमा का प्राकट्य

श्रीमती प्रेमावती (पत्नी स्मृतिशेष श्री रामेश्वर मिश्र) ने चबूतरे का निर्माण शुरू कराया। भराव के समय पीछे के गड्ढे से मिट्टी खोदते हुए माँ दुर्गा की पाषाण प्रतिमा प्रकट हुई।

04

लगभग 2000

मंदिर की दीवारें

वर्ष 2000 के आसपास मंदिर की दीवारें खड़ी की गईं।

05

2006

मंदिर की छत

श्री बाराती लाल वर्मा ने 11,000 रुपये दिए। अतिरिक्त ग्रामदान से श्री सुंदर लाल विश्वकर्मा और श्री श्याम लाल राजपूत ने छत डाली।

06

2015

प्लास्टर और फर्श

यूकेलिप्टस के पेड़ों की बिक्री से मिले 14,000 रुपये से श्री सुमित मिश्रा और श्री राजेश यादव की अध्यक्षता में प्लास्टर और फर्श बना।

07

2016

मंदिर का भव्य गुंबद

श्री राजेश कुमार रावत के 1,50,000 रुपये और प्रधान श्री निर्गेश कुमार गौतम के दान से गुंबद बना। श्री सुमित कुमार मिश्रा की देख-रेख में दो मिस्त्रियों और ग्रामवासियों ने लगभग दो महीने सेवा दी।

08

समय के साथ

परिसर में इंटरलॉकिंग

विधायक श्री सतीश शर्मा ने परिसर में इंटरलॉकिंग तथा ब्लॉक प्रमुख श्री मिंटू सिंह ने बाउंड्री के किनारे इंटरलॉकिंग सड़क बनवाई।

प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक परिसर

वृक्षों के साथ बढ़ता परिसर

वृक्षारोपण और परिसर विकास के दर्ज पड़ाव — 1997, 2013, 2016 और 2019।

पुरानी पकड़िया एवं दो नीम

पुरानी पकड़िया एवं दो नीम

श्री रामसमुझ गौतम (श्री भंडारी बाबा हुसैनी गौतम के पिता) ने 1997 में पुरानी पकड़िया और मंदिर के सामने दो नीम लगाए। वर्ष 2013 के आसपास श्रीमती प्रेमावती (स्मृतिशेष श्री रामेश्वर मिश्र) ने नीम के पास पूजनीय चबूतरा बनवाया।

नई पकड़िया

नई पकड़िया

श्री सुनील कुमार वर्मा ने 2016 में नई पकड़िया लगाई। पुरानी और नई पकड़िया के चबूतरे 6 नवंबर 2025 को श्री संदीप कुमार वर्मा की अध्यक्षता में बनाए गए।

पीपल

पीपल

श्री कृष्ण कुमार मिश्रा (पुत्र श्री रमेश दत्त मिश्रा) ने वर्ष 2019 के आसपास पीपल का वृक्ष रोपा।

बरगद

बरगद

श्री नरेंद्र कुमार वर्मा (पुत्र श्री दिवाकर वर्मा) ने वर्ष 2019 के आसपास बरगद का पौधा रोपा।

1993 — वर्तमान

समिति नेतृत्व यात्रा

1993 में पहली दुर्गा समिति के गठन से आज तक — नेतृत्व और सेवा की सामूहिक यात्रा।

1993 से श्री रामतीरथ वर्मा अध्यक्ष
2015–2016 श्री सुमित कुमार व श्री राजेश कुमार यादव अध्यक्ष
2017–2020 श्री रामतीरथ वर्मा अध्यक्ष
2021 से वर्तमान श्री संदीप कुमार वर्मा अध्यक्ष

परंपरा के नींव-निर्माता एवं मार्गदर्शक

श्री राम तीरथ वर्मा · श्री लल्ला वर्मा · श्री चपरासी दादा · श्री राम लखन रावत · श्री ननकऊ धीमान · श्री जगपाल वर्मा · श्री चंद्रिका प्रसाद प्रजापति · श्री श्याम लाल राजपूत · श्री बेंचू यादव · श्री रामजस चौहान · श्री सुंदर लाल विश्वकर्मा

1993 से चली आ रही परंपरा

मूर्ति विसर्जन की परंपरा

प्रारंभिक मार्ग आनंदपुरवा, डालमऊ, नियमातगंज और गुलामपुरवा से नवाबगंज पुल तक था। आनंदपुरवा भट्ठा मार्ग बनने पर यात्रा पंसारा नाला और नियमातगंज से जाने लगी। बाद में गाँव से होकर दक्षिण स्थित कोटवा और चांदामऊ के बाहर-बाहर वर्तमान नवाबगंज घाट तक मार्ग तय हुआ। 13 अप्रैल 2019 को स्थायी मूर्ति स्थापना के बाद इसी मार्ग से कलश विसर्जन होने लगा।

मंच पर जीवित परंपरा

रामलीला — भक्ति और लोक-स्मृति

बादशाह नगर की रामलीला यात्रा के दर्ज पड़ाव।

प्रथम चरण

श्री राम करन चौहान, श्री पुत्ती लाल रावत, श्री शिव प्रसाद राजपूत, श्री जगदेव राजपूत, श्री शिव बक्श चौहान, श्री कन्हैया लाल वर्मा और श्री छवि नाथ चौहान ने मार्गदर्शन एवं निर्देशन किया।

द्वितीय चरण का पुनः आरंभ

कुछ वर्षों के विराम के बाद श्री सुमित कुमार मिश्रा और श्री पुत्ती लाल रावत के निर्देशन में रामलीला फिर शुरू हुई।

नव युवक रामलीला समिति

श्री रवि कुमार यादव के सुझाव पर समिति का नाम रखा गया।

गाँव में रामलीला मंचन की समृद्ध परंपरा दो चरणों से होकर गुजरी है: प्रथम चरण (1994): रामलीला का पहला मंचन वर्ष 1994 में प्रारंभ हुआ। इसके कुशल मार्गदर्शन और निर्देशन में श्री राम करन चौहान, श्री पुत्ती लाल रावत, श्री शिव प्रसाद राजपूत, श्री जगदेव राजपूत, श्री शिव बक्श चौहान, श्री कन्हैया लाल वर्मा और श्री छवि नाथ चौहान की मुख्य भूमिका रही। द्वितीय चरण (2013 से अब तक): कुछ वर्षों के विराम के पश्चात लगभग वर्ष 2013 में श्री सुमित कुमार मिश्रा और श्री पुत्ती लाल रावत के निर्देशन में रामलीला का पुनः शुभारंभ हुआ। वर्ष 2017 में श्री रवि कुमार यादव के सुझाव पर इसे 'नव युवक रामलीला समिति' का नाम दिया गया।

स्मृति को प्रणाम

अतीत के दीपक – पूर्व कलाकार

अतीत के दीपक – प्रथम चरण के पूर्व कलाकार

श्री उमेश चंद्र मिश्रा · श्री हरि ओम मिश्रा · श्री छवि नाथ चौहान (दानी बाबा) · श्री पुत्ती लाल रावत · श्री कन्हैया लाल वर्मा · श्री तिवारी विश्वकर्मा · श्री मायाराम यादव · श्री संदीप रावत · श्री प्रवेश रावत · श्री मुरलीधर वर्मा · श्री तेज नारायण चौहान · श्री राम नेवाज धोबी · श्री मनी राम गौतम · श्री देवेंद्र नारायण चौहान · श्री सूर्य कांत मिश्रा · श्री सुनील कुमार मिश्रा · श्री राम करन चौहान · श्री डॉ. शिव बक्श · श्री शिव प्रसाद राजपूत · श्री जगदेव राजपूत · श्री बेचन अली · श्री बुद्धुलाल राजपूत · श्री विदेशी रावत

अतीत के दीपक – द्वितीय चरण के पूर्व कलाकार

श्री राजेश मिश्रा (पप्पू दादा) · श्री अंकित कनौजिया · श्री शिवानंद लाल · श्री लक्ष्मी प्रसाद · श्री चंद्रकांत मिश्रा (जैकी) · श्री सौरभ मिश्रा (अंकित) · श्री विकास मिश्रा (छोटू) · श्री राज बहादुर वर्मा · श्री रंजीत वर्मा · श्री रोहित चौरसिया · श्री अमरेश वर्मा

दृश्य अभिलेख

रामलीला एवं धार्मिक आयोजन के वीडियो

रामलीला समिति के निर्देशन का दायित्व श्री राम करन, श्री पुत्ती लाल, श्री सुमित कुमार, श्री गुंजन कुमार और श्री सुनील कुमार वर्मा (प्रो.) ने निभाया। वीडियो रिकॉर्डिंग में श्री सुशील कुमार वर्मा, श्री राज कपूर वर्मा, श्री कृष्ण वर्मा और श्री अमित वर्मा ने सेवाएँ दीं।

वीडियो फ़ाइलें यहाँ उपलब्ध नहीं हैं। वास्तविक रिकॉर्डिंग प्राप्त होने पर जोड़ी जाएंगी।

मूल ऐतिहासिक अभिलेख

गाँव के मंदिर की पूरी कथा

यहाँ संकलित मूल विवरण को उसके शब्दों और क्रम सहित सुरक्षित रखा गया है।

गाँव के मंदिर, माँ दुर्गा सेवा समिति एवं रामलीला मंचन का संक्षिप्त इतिहास

गाँव का यह मंदिर, जो लोगो की आस्था, संस्कृति और सामूहिक एकता का प्रतीक है यहाँ पर प्रति वर्ष नवरात्रि में माँ दुर्गा की पूजा और रामलीला का मंचन होता है और सालभर समय-समय पर और भी धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहते हैं ।लोग यहाँ शारीरिक , मानसिक और आर्थिक रूप से सहयोग करते हुए समावेशी समाज का प्रतिबिंब प्रस्तुत करते है जहाँ हर वर्ग समान है सहयोग भी समान है और सबका सम्मान भी समान है । यही समानता लोगो की भावनात्मक आस्था को एकजुट करते हुए गाँव के इस मंदिर के गर्भगृह में विराजमान माँ दुर्गा के चरणों से जोड़ती है। जैसे-जैसे ग्रामवासी समय के चक्र में आगे बढ़ रहे हैं उनकी आस्था इस भव्य मंदिर व परिसर में और भी गहरी होती जा रही है। यह केवल एक मंदिर और परिसर मात्र नहीं है सनातन संस्कृति की झलक , परंपरा का प्रतिबिंब , आस्था का केंद्र और सांसारिक दुखों से परे एक आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण सुंदर , सुरम्य और सुखद धरा है। गाँव के निवासी दुनिया में कहीं भी हो पर उनका मन , उनकी आस्था और उनकी सकारात्मक ऊर्जा यहीं है। समय बदलेगा, लोग बदलेंगे , लोगों की प्राथमिकताएं बदलेंगी पर ये परम्परा की डोर हमेशा विद्यमान रहेगी - भूतकाल के लोगों के विचारों और योगदान के रूप में , वर्तमानकाल के लोगों के अथक प्रयासों के रूप में और भविष्यकाल के लोगों के आधुनिक और परिवर्तनवादी सोच के रूप में । इसलिए यह इतिहास लिखने का निहितार्थ भूत , वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को और अधिक मजबूत डोर से बाँधना है जिससे कि ये परंपरा और संस्कृति अक्षुण रहे और निरंतर गतिमान रहे । साथ ही साथ भावी पीढ़ी को आगे बढ़ने का दृष्टिकोण मिले और हमारे पूर्वज और उनका अतुल्य योगदान हमारी स्मृति में हमेशा ज़िंदा रहे। क्योंकि व्यक्ति नहीं बल्कि उसकी स्मृति ही अमर हो सकती है और समाज नहीं बल्कि उसकी संस्कृति,परंपरा और उसके मूल्य ही अमर सकतें है।

आस्था का प्राकट्य, अलौकिक प्रसंग और मंदिर निर्माण की यात्रा

यह कहानी है बादशाह नगर की, जहाँ ज़मीन के एक टुकड़े ने विवाद की जगह त्याग और एकता की मिसाल पेश की। बात 1982 की है, जब गाँव में चकबंदी चल रही थी। गाँव के पूर्व में स्थित श्री ठाकुर दिनेश प्रताप सिंह का एक बाग हरिजन आबादी के विस्तार के लिए छोड़ दिया गया। धीरे-धीरे ग्रामीणों ने उस खाली पड़ी ज़मीन को अपनी-अपनी कटी फसलों की मड़ाई (तैयार) करने के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया और गाँव की आम बोलचाल में इस ज़मीन को लोग "आफ़र" कहने लगे।

गाँव में जन-आस्था के इस महान केंद्र की वास्तविक शुरुआत वर्ष 1993 में हुई, जब पहली बार माँ दुर्गा की मूर्ति स्थापित करने का पावन विचार श्री लल्ला वर्मा, श्री दिवाकर वर्मा और श्री राम तीरथ वर्मा के मन में आया। गाँव वालों ने इसी "आफ़र" वाली ज़मीन पर पहली बार माता दुर्गा जी की मूर्ति स्थापित कर उत्सव मनाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। उस पावन निर्णय के बाद से आज तक न तो किसी ने उस ज़मीन पर व्यक्तिगत अधिकार जताया और न ही कभी कोई विरोध हुआ। वह पुरानी बाग की ज़मीन अब माँ दुर्गा के भव्य एवं प्रसिद्ध मंदिर परिसर के रूप में जानी जाती है, जो बादशाह नगर के लोगों की आस्था, त्याग और आपसी भाईचारे का जीता-जागता प्रतीक है।

इसी वर्ष (1993 में ) श्री दिनेश प्रताप सिंह के प्रयासों से प्रथम दुर्गा समिति का गठन किया गया, तथा शुरुआती दिनों में एक साधु-बाबा के आगमन के पश्चात् श्री देवेंद्र नारायण चौहान ने मंदिर के प्रथम पुजारी के रूप में दायित्व संभाला।

मंदिर के भौतिक स्वरूप के विकास की कहानी ग्रामवासियों की सामूहिक सहभागिता और असीम श्रद्धा की अनुपम मिसाल है। सबसे पहले श्रीमती प्रेमावती (स्मृतिशेष श्री रामेश्वर मिश्र) ने मंदिर के चबूतरे के निर्माण का पावन कार्य प्रारंभ कराया। जब चबूतरे के भराव (पटाई) का कार्य चल रहा था, तभी मंदिर के ठीक पीछे स्थित गड्ढे से मिट्टी खोदते समय माँ दुर्गा की एक पाषाण (पत्थर) प्रतिमा प्रकट हुई। इस अलौकिक घटना से समस्त ग्रामवासियों में असीम श्रद्धा और हर्ष की लहर दौड़ गई, तथा मंदिर के प्रति जन-आस्था और अधिक गहरी हो गई। इस दैवीय अनुभूति से अभिभूत होकर पूरे गाँव के लोगों ने माँ की इस दिव्य प्रतिमा पर पूर्ण श्रद्धाभाव से दान व सहयोग अर्पित किया।

इसके पश्चात वर्ष 2000 के आसपास मंदिर की दीवारें खड़ी की गईं। वर्ष 2006 में सर्वसम्मति से ग्रामवासियों द्वारा बीडीसी चुने जाने की प्रसन्नता में श्री बाराती लाल वर्मा ने 11,000 रुपये का सहयोग दिया, जिसके साथ गाँव वालों के अतिरिक्त दान से मिस्त्री श्री सुंदर लाल विश्वकर्मा और श्री श्याम लाल राजपूत द्वारा मंदिर की छत डाली गई। आगे चलकर वर्ष 2015 में मंदिर के यूकेलिप्टस के पेड़ों को बेचने से प्राप्त 14,000 रुपये की राशि से श्री सुमित मिश्रा और श्री राजेश यादव की अध्यक्षता में मंदिर का प्लास्टर और फर्श निर्माण पूरा कराया गया।

वर्ष 2016 में जब पुनः गाँव वालों ने सर्वसम्मति से श्री राजेश कुमार रावत को बीडीसी चुना, तो उनके द्वारा प्राप्त 1,50,000 रुपये के सहयोग और तत्कालीन प्रधान श्री निर्गेश कुमार गौतम के अतिरिक्त दान से मंदिर के भव्य गुंबद का निर्माण शुरू हुआ। श्री सुमित कुमार मिश्रा की देख-रेख में भिटरिया के पास से आए दो मिस्त्रियों द्वारा लगभग दो महीने तक चले इस कार्य में श्री आलोक कुमार चौहान, श्री हुसैनी प्रसाद गौतम, श्री राम सिंह दर्जी और श्री गुंजन कुमार वर्मा ने मुख्य मजदूर के रूप में सेवाएँ दीं, साथ ही संपूर्ण ग्रामवासियों का दैनिक सहयोग भी सराहनीय रहा। समय के साथ जन-प्रतिनिधियों का भी सहयोग मिला, जिसमें खाद्य एवं रसद मंत्री माननीय विधायक श्री सतीश शर्मा द्वारा परिसर में इंटरलॉकिंग तथा ब्लॉक प्रमुख श्री मिंटू सिंह द्वारा बाउंड्री के किनारे इंटरलॉकिंग सड़क का निर्माण करवाया गया।

परिसर का प्राकृतिक और आध्यात्मिक स्वरूप

मंदिर परिसर को सुरम्य और हरा-भरा बनाने में भी विभिन्न ग्रामवासियों का विशेष योगदान रहा है। वर्ष 1997 में श्री रामसमुझ गौतम (श्री भंडारी बाबा हुसैनी गौतम के पिता) ने विद्युत पोल के समीप वाली पुरानी पकड़िया तथा मंदिर के सामने स्थित दो नीम के वृक्षों का रोपण किया था। इस नीम के वृक्ष के समीप वर्ष 2013 के आसपास श्रीमती प्रेमावती (स्मृतिशेष श्री रामेश्वर मिश्र) द्वारा पूजनीय चबूतरा बनवाया गया।

आगे चलकर वर्ष 2016 में श्री सुनील कुमार वर्मा ने नई पकड़िया का पौधा लगाया। इन पुरानी और नई पकड़िया के चबूतरे का निर्माण 6 नवंबर 2025 को श्री संदीप कुमार वर्मा (पुत्र स्मृतिशेष श्री रामतीरथ वर्मा) की अध्यक्षता में मिस्त्री श्री शंभू शरण राजपूत, श्री राम करन रावत और श्री सुशील कुमार वर्मा द्वारा संपन्न हुआ। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2019 के आसपास श्री कृष्ण कुमार मिश्रा (पुत्र स्मृतिशेष श्री रमेश दत्त मिश्रा) ने पीपल का वृक्ष तथा श्री नरेंद्र कुमार वर्मा (पुत्र स्मृतिशेष श्री दिवाकर वर्मा) ने बरगद का पौधा रोपकर परिसर को आध्यात्मिक छाँव प्रदान की।

दुर्गा पूजा समिति का नेतृत्व, परंपरा और परिवर्तन

दुर्गा पूजा समिति के नेतृत्व की बागडोर कालखंड के अनुसार समर्पित निष्ठावानों के हाथों में रही। वर्ष 1993 से समिति का कुशल नेतृत्व श्री रामतीरथ वर्मा ने संभाला। इसके बाद 2015 से 2016 तक श्री सुमित कुमार व श्री राजेश कुमार यादव, पुनः 2017 से 2020 तक श्री रामतीरथ वर्मा, तथा वर्ष 2021 से वर्तमान तक श्री संदीप कुमार वर्मा अध्यक्ष पद का दायित्व संभाल रहे हैं। इस पूरी परंपरा की नींव रखने और मार्गदर्शक की भूमिका निभाने में श्री राम तीरथ वर्मा, श्री लल्ला वर्मा, श्री चपरासी दादा, श्री राम लखन रावत, श्री ननकऊ धीमान, श्री जगपाल वर्मा, श्री चंद्रिका प्रसाद प्रजापति, श्री श्याम लाल राजपूत, श्री बेंचू यादव, श्री रामजस चौहान और श्री सुंदर लाल विश्वकर्मा का योगदान अतुलनीय है।

वर्ष 1993 से ही मूर्ति विसर्जन की परंपरा नवाबगंज पुल से जुड़ी रही है, जिसे समय-समय पर प्रशासनिक निर्देशों और सुगमता के अनुसार बदला गया। प्रारंभ में विसर्जन यात्रा बादशाह नगर से आनंदपुरवा, डालमऊ के अंदर से होते हुए नियमातगंज और गुलामपुरवा के रास्ते नवाबगंज पुल तक जाती थी। कालांतर में आनंदपुरवा भट्ठा मार्ग बनने पर यह यात्रा बादशाह नगर से पंसारा नाला होते हुए नियमातगंज के रास्ते जाने लगी। अंततः व्यवस्था सुदृढ़ होने पर मूर्ति को गाँव में घुमाकर दक्षिण स्थित कोटवा और चांदामऊ गाँव के बाहर-बाहर नवाबगंज पुल (वर्तमान घाट) पर विसर्जन की परंपरा स्थापित हुई। मंदिर में 13 अप्रैल 2019 को स्थायी मूर्ति की स्थापना हुई, जिसके बाद से इसी मार्ग से कलश विसर्जन संपन्न किया जाने लगा।

डिजिटल युग में इस परंपरा को सहेजने और प्रसारित करने के ध्येय से वर्ष 2026 में श्री शिव ओम मिश्रा के सुझाव और तकनीकी प्रयास से समिति की आधिकारिक वेबसाइट तैयार की गई। इसी दौरान श्री गुंजन कुमार के सुझाव पर समिति को 'माँ दुर्गा सेवा समिति' का नाम दिया गया।

रामलीला मंचन का इतिहास और इसके कालजयी कलाकार

गाँव में रामलीला मंचन की समृद्ध परंपरा दो चरणों से होकर गुजरी है:

प्रथम चरण (1994): रामलीला का पहला मंचन वर्ष 1994 में प्रारंभ हुआ। इसके कुशल मार्गदर्शन और निर्देशन में श्री राम करन चौहान, श्री पुत्ती लाल रावत, श्री शिव प्रसाद राजपूत, श्री जगदेव राजपूत, श्री शिव बक्श चौहान, श्री कन्हैया लाल वर्मा और श्री छवि नाथ चौहान की मुख्य भूमिका रही।

अतीत के दीपक (प्रथम चरण के पूर्व कलाकार): इस शुरुआती दौर में जिन कलाकारों ने मंच पर अपनी कला की अमिट छाप छोड़ी और अब वर्तमान में अभिनय नहीं कर रहे हैं, उन पूर्व कलाकारों में श्री उमेश चंद्र मिश्रा,श्री हरि ओम मिश्रा ,श्री छवि नाथ चौहान (दानी बाबा), श्री पुत्ती लाल रावत, श्री कन्हैया लाल वर्मा, श्री तिवारी विश्वकर्मा, श्री मायाराम यादव, श्री संदीप रावत, श्री प्रवेश रावत, श्री मुरलीधर वर्मा, श्री तेज नारायण चौहान, श्री राम नेवाज धोबी, श्री मनी राम गौतम, श्री देवेंद्र नारायण चौहान, श्री सूर्य कांत मिश्रा, श्री सुनील कुमार मिश्रा, श्री राम करन चौहान, श्री डॉ. शिव बक्श, श्री शिव प्रसाद राजपूत, श्री जगदेव राजपूत, श्री बेचन अली, श्री बुद्धुलाल राजपूत और श्री विदेशी रावत शामिल हैं।

द्वितीय चरण (2013 से अब तक): कुछ वर्षों के विराम के पश्चात लगभग वर्ष 2013 में श्री सुमित कुमार मिश्रा और श्री पुत्ती लाल रावत के निर्देशन में रामलीला का पुनः शुभारंभ हुआ। वर्ष 2017 में श्री रवि कुमार यादव के सुझाव पर इसे 'नव युवक रामलीला समिति' का नाम दिया गया।

अतीत के दीपक (द्वितीय चरण के पूर्व कलाकार): नव युवक रामलीला समिति के पुनरुद्धार के दौर में जिन्होंने अभिनय के रूप में अपना योगदान दिया पर अब मंच पर सक्रिय नहीं हैं, उनमें श्री राजेश मिश्रा (पप्पू दादा) ,श्री अंकित कनौजिया, श्री शिवानंद लाल, श्री लक्ष्मी प्रसाद, श्री चंद्रकांत मिश्रा (जैकी), श्री सौरभ मिश्रा (अंकित), श्री विकास मिश्रा (छोटू) ,श्री राज बहादुर वर्मा, श्री रंजीत वर्मा, श्री रोहित चौरसिया और श्री अमरेश वर्मा प्रमुख हैं।

रामलीला समिति के कुशल मार्गदर्शन का दायित्व समय-समय पर श्री राम करन, श्री पुत्ती लाल, श्री सुमित कुमार, श्री गुंजन कुमार और श्री सुनील कुमार वर्मा (प्रो.) ने डायरेक्टर के रूप में निभाया। रामलीला के इन ऐतिहासिक क्षणों को सहेजने के लिए श्री गुंजन कुमार के विचार पर वीडियो रिकॉर्डिंग की शुरुआत हुई, जिसमें कालक्रम के अनुसार श्री सुशील कुमार वर्मा, श्री राज कपूर वर्मा, श्री कृष्ण वर्मा और श्री अमित वर्मा ने कैमरामैन के रूप में अपनी सेवाएँ दीं।

भविष्य की ओर

आशा की किरण

हर वर्ष गांव के लोगों ने अपने पूर्ण समर्पण भाव से प्रत्येक उत्सव को अभिसिंचित किया है। गांव के हर व्यक्ति का इस उत्सव और परंपरा में किसी न किसी रूप में योगदान रहा है, चाहे वह मानसिक स्तर पर हो, शारीरिक श्रम के रूप में हो या आर्थिक योगदान के रूप में। गांव के सभी लोगों के सहयोग और आस्था को नमन है। एकता, समृद्धि, सहयोग और आस्था की परंपरा अनंतकाल तक अक्षुण्ण रहे — मां दुर्गा के चरणों में ग्रामवासियों का निवेदन।

कृतज्ञता सहित

इतिहास संकलन व अभिलेखीकरण श्रेय

इस संपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी को श्री सुमित कुमार मिश्र द्वारा एकत्रित किया गया, गुंजन कुमार द्वारा संकलित एवं संशोधित किया गया, तथा शिव ओम मिश्र द्वारा व्यवस्थित करके डिजिटल रूप में वेबसाइट पर प्रदर्शित किया गया।

  • श्री सुमित कुमार मिश्र
  • गुंजन कुमार
  • शिव ओम मिश्र

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भक्तिमय ध्वनि